केंचुओं से बदलेगी खेती की तस्वीर,नंदना में बड़े पैमाने पर वर्मी कंपोस्ट,महिलाओं को मिला रोजगार का सहारा
महराजगंज। जनपद महाराजगंज के मिठौरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम सभा नंदना में कृषि विशेषज्ञ नागेंद्र पांडेय के यहां बड़े पैमाने पर केंचुआ पालन एवं वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की व्यवस्था की गई है। यहां किसानों को वर्मी कंपोस्ट बनाने की पूरी प्रक्रिया के साथ-साथ जैविक खाद के खेती और फसल पर होने वाले लाभ की जानकारी भी विशेषज्ञों द्वारा दी जाती है।
केंद्र पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में महिलाएं वर्मी कंपोस्ट तैयार करने में जुटी हुई हैं। महिलाएं गोबर, जैविक अवशेष और केंचुओं की मदद से वर्मी कंपोस्ट तैयार कर रही हैं। इससे जहां किसानों को जैविक खेती के प्रति जागरूक किया जा रहा है, वहीं ग्रामीण महिलाओं को काम से जोड़ने की दिशा में भी पहल दिखाई दे रही है।
पशुओं के गोबर का बेहतर उपयोग
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्मी कंपोस्ट मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने, मिट्टी की संरचना और उर्वरा शक्ति सुधारने तथा रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने में उपयोगी हो सकता है। किसान अपने पशुओं के गोबर का बेहतर उपयोग करते हुए खेत के लिए जैविक खाद तैयार कर सकता है।
नंदना स्थित यह केंद्र किसानों के लिए सीखने का एक ऐसा स्थान बन रहा है, जहां उन्हें सिर्फ वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की जानकारी ही नहीं दी जा रही, बल्कि इसके सही उपयोग और खेती में संभावित फायदे भी समझाए जा रहे हैं।
महिलाओं की मेहनत बनी बदलाव की तस्वीर
केंद्र पर प्रतिदिन दर्जनों महिलाएं वर्मी कंपोस्ट तैयार करने में अपनी मेहनत और हुनर का प्रदर्शन कर रही हैं। इससे यह संदेश भी सामने आ रहा है कि यदि ग्रामीण स्तर पर जैविक खेती और वर्मी कंपोस्ट को बढ़ावा मिले तो महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर और किसानों के लिए कम लागत वाली खेती के रास्ते खुल सकते हैं।
किसानों तक पहुंचे तकनीक और योजनाओं का लाभ
सरकार की ओर से जैविक खेती को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में जरूरत है कि कृषि विभाग और जिम्मेदार अधिकारी गांव-गांव किसानों को वर्मी कंपोस्ट, जैविक खेती, प्रशिक्षण और उपलब्ध सरकारी योजनाओं की जानकारी प्रभावी ढंग से पहुंचाएं।
नंदना की यह पहल बताती है कि किसान अगर गोबर और जैविक अवशेष को बेकार समझने के बजाय उसका वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल करें, तो खेत की मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ अतिरिक्त आय का रास्ता भी बनाया जा सकता है।
सवाल अब यह है—नंदना जैसी पहल को जिले के अन्य गांवों तक कब पहुंचाया जाएगा, ताकि अन्नदाता की खेती मजबूत हो और गांव की महिलाओं को भी रोजगार के नए अवसर मिल सकें?
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