खामोश हो गई चिट्ठियों की आवाज, सूनी हुई पत्र पेटिका
डॉ अर्जुन पटेल
एक दौर था जब गांव की गलियों में साइकिल की घंटी सुनते ही लोग दरवाजे पर आ जाते थे। डाकिए के हाथ में पकड़ी चिट्ठी सिर्फ कागज नहीं, बल्कि अपनों का हाल-चाल, उम्मीद और इंतजार का जवाब होती थी।
गांव के चौराहे या स्कूल के पास लगी लाल रंग की पत्र पेटिका लोगों की भावनाओं का केंद्र थी। उसमें डाली गई हर चिट्ठी के साथ जुड़ी होती थी किसी मां की ममता, किसी बेटे की नौकरी की खबर या किसी छात्र का परीक्षा परिणाम।
लेकिन आज वही पत्र पेटिका खुद बेखबर खड़ी है। जिस पर कभी हर दिन नजरें टिकी रहती थीं, आज वह धूल फांक रही है। डिजिटल युग ने संवाद के तरीके बदल दिए हैं।
इंतजार की मिठास भी छीन
मोबाइल फोन, व्हाट्सएप और सोशल मीडिया ने दूरी को खत्म तो कर दिया, पर इंतजार की मिठास भी छीन ली। अब संदेश सेकेंडों में पहुंच जाता है, मगर वह भावनात्मक स्पर्श कहीं खो गया है।
गांव के बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि कैसे डाकिया गांव में सम्मान का प्रतीक होता था। बच्चे उसके पीछे-पीछे दौड़ते थे और घरों में चिट्ठी पढ़कर सुनाने की परंपरा थी। आज न डाकिए की घंटी सुनाई देती है, न पत्र पेटिका में चिट्ठियों की खनक।
आस की पेटिका’ अब इतिहास
समय बदला है, तकनीक आगे बढ़ी है, लेकिन कहीं न कहीं गांव की वह ‘आस की पेटिका’ अब इतिहास बनती जा रही है। सवाल यही है—क्या सुविधा की दौड़ में हमने संवेदनाओं का वह दौर पीछे छोड़ दिया?
बदलते समय की यह कहानी सिर्फ एक पत्र पेटिका की नहीं, बल्कि उन यादों की है जो अब बीते जमाने की विरासत बन चुकी हैं।
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