श्मशान की जमीन पर सात फेरे? भीसवा में विवाह भवन के प्रस्ताव ने मचाया बवाल
ग्रामीणों ने डीएम से लेकर मुख्यमंत्री तक लगाई गुहार, जिला पंचायत सदस्य के सामने भी रखा विरोध; बोले—सदियों पुरानी अंतिम संस्कार की भूमि से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं
महराजगंज। सदर ब्लॉक अंतर्गत ग्राम सभा भीसवा में श्मशान भूमि पर प्रस्तावित विवाह भवन निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिस भूमि पर कई पीढ़ियों से अंतिम संस्कार होता चला आ रहा है
उसी भूमि को विवाह भवन निर्माण के लिए प्रस्तावित कर दिया गया है। इस मामले को लेकर ग्रामीणों ने जिलाधिकारी के समक्ष सामूहिक ज्ञापन सौंपने के साथ ही मुख्यमंत्री को भी अपनी शिकायत से अवगत कराया है।
रविवार को ग्रामीणों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत सदस्य अभय सिंह को मौके पर बुलाकर पूरे प्रकरण की जानकारी दी ।
श्मशान भूमि पर विवाह भवन का निर्माण नहीं कराने की मांग रखी। ग्रामीणों की बात सुनने के बाद जिला पंचायत सदस्य ने भी श्मशान की पुरानी भूमि पर विवाह भवन बनाने के प्रस्ताव को अनुचित बताया।
अभय सिंह ने कहा कि यदि ग्रामीणों के अनुसार यह भूमि कई पीढ़ियों से श्मशान के रूप में इस्तेमाल होती रही है तो वहां विवाह भवन का निर्माण कराना उचित नहीं है।
उन्होंने सवाल उठाया कि “अगर निर्माण के लिए नींव की खुदाई के दौरान मानव कंकाल निकल आए तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?” उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार से जुड़ी भूमि को किसी दूसरे प्रयोजन में इस्तेमाल करने का निर्णय लेने से पहले सभी तथ्यों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए।
ग्रामीणों का आरोप है कि वर्तमान ग्राम प्रधान, लेखपाल और कानूनगो द्वारा अभिलेखों के आधार पर श्मशान भूमि को अलग तरीके से दर्शाते हुए विवाह भवन का प्रस्ताव प्रशासन को भेजा गया है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ग्रामीणों ने पूरे मामले की राजस्व अभिलेखों, मौके की स्थिति और पूर्व में भूमि के इस्तेमाल की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
जहां शव जलते रहे, वहां कैसे होंगे सात फेरे?
ग्रामीणों का कहना है कि जिस स्थान पर वर्षों से शवों का अंतिम संस्कार होता आया है, वहां विवाह भवन बनाना धार्मिक एवं सामाजिक भावनाओं से जुड़ा गंभीर विषय है।
उनका सवाल है कि “जिस जमीन पर अंतिम विदाई होती रही, वहां कौन वर-वधू सात फेरे लेगा?” ग्रामीणों ने कहा कि विकास कार्य के नाम पर ऐसी जमीन का चयन किया जाना उनकी भावनाओं और परंपराओं के साथ खिलवाड़ के समान है।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि इसी भूमि पर ग्राम प्रधान द्वारा बोर्ड लगाकर वृक्षारोपण कराया गया और इस कार्य में सरकारी धन खर्च किया गया।
ऐसे में उनका कहना है कि यदि भूमि वास्तव में श्मशान के रूप में इस्तेमाल होती रही है तो पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि राजस्व अभिलेखों में उसकी वास्तविक स्थिति क्या है और पूर्व में वहां कराए गए कार्य किस आधार पर किए गए।
विवाह भवन के लिए दूसरी जमीन होने का दावा
ग्रामीणों का कहना है कि विवाह भवन निर्माण के लिए गांव में अन्य भूमि उपलब्ध है। उनके अनुसार भीसवा मंदिर के पीछे काफी बंजर भूमि मौजूद है, जिसे विवाह भवन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि उक्त भूमि पर कब्जे की स्थिति की भी जांच होनी चाहिए और यदि वह सरकारी/सार्वजनिक भूमि है तो प्रशासन को उसकी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
ग्रामीणों ने मांग की है कि श्मशान भूमि की पैमाइश कराकर पुराने राजस्व अभिलेखों, मौके के इस्तेमाल और वर्तमान प्रस्ताव की जांच कराई जाए। साथ ही विवाह भवन के प्रस्ताव को तब तक आगे न बढ़ाया जाए, जब तक भूमि की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट न हो जाए।
इस दौरान रामलाल, रामनेवारे गुप्ता, फिरोज, हरी, ईशरी, रामचंदर, हीरा, रब्बुल, रामराज, रामसूरत, लक्ष्मण, परभंश, रामबेलास, लोरीक, ठाकुर, रामानंद सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि श्मशान भूमि को बचाने के लिए वे हर स्तर पर अपनी आवाज उठाएंगे।
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